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कांगड़ी धाम : मदरा, राजमाह, चने की दाल, मटर पनीर, माह की दाल,छोलिया, कड़ी…

निखिल ठाकुर ।।  काँगड़ा हिमाचल प्रदेश के प्रमुख जिलों में से एक है | काँगड़ा में विवाह शादियों में एक विशेष प्रकार के भोज का आयोजन किया जाता है जिसे धाम कहते हैं |कांगड़ी धाम में खाना खाने वालों की संख्या सेंकडों से ले कर हजारों तक की हो सकती है, पर उन्हें खिलाने का काम चन्द लोगों के हाथ में होता है, खाना बनाने वाले को बोटी का जाता है, और उसके हेल्परों को काम्मे कहा जाता है |

सिर्फ एक वोटी चार कामों के साथ मिल कर हजारों लोगों के लिए खाना बना सकते है , और उन्हें महज दो या तीन घंटे में बाँट कर खिला भी सकते है | बोटी और काम्मों  की रफ़्तार किसी अजूबे से कम नहीं होती | | ये एक ऐसा भोज है जिसे बहुत कम लोगों द्वारा, बहुत कम समय में हजारों लोगों के लिए बनाया जाता है, फिर भी स्वाद इतना कि जो भी खाए बस उँगलियाँ ही चाटता रह जाये |आमतौर पर कांगड़ी धाम में चावल के साथ सात या नौ प्रकार की दालें और सब्जियां बनायीं जाती हैं, कई जगह पर इससे अधिक भी बनायीं जाती हैं |

कांगड़ी धाम में खाना धरती पर एक लम्बी चटाई या टाट पर लम्बी लाइन में बैठा कर खिलाया जाता है जिसे पैंठ कहा जाता है | परम्परागत तरीके से खाना एक विशेष प्रकार के पत्तल में परोसा जाता है जिसे पतलू कहा जाता है | खाने में चावल के साथ सब से पहले क्रमशः मदरा, राजमाह, चने की दाल, मटर पनीर, माह की दाल, छोलिया, कड़ी परोसा जाता है , इसके आलावा कई बार पालक पनीर, अरहर की दाल, रोंगी इतियादी भी परोसे जाते हैं | सबसे अंत में मीठे चावल या बूंदी का मीठा परोसा जाता हैं |

धीरे धीरे कांगड़ी धाम अब लुप्त सी होती जा रही है | अब लोग खाने के लिए आधुनिक तौर तरीकों को अपना रहे हैं , जैसे पत्तल की जगह रेडिमेड डिस्पोजल प्लेट्स और गिलास का प्रयोग किया जा रहा है, अधिकतर लोग अपना स्टेंडर्ड दिखाने के चक्कर में स्टैंडिंग बुफे का आयोजन कर रहे हैं | खाने में आधुनिक चीजों का प्रयोग किया जा रहा है, शायद अगले 10- 12 सालों में कांगड़ी धाम विलुप्त हो जाएगी |

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