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अब डरें नहीं, सड़क पर गिरे व्यक्ति की मदद करें : सुप्रीमकोर्ट

सड़क हादसे के मददगार को अब न अस्पताल तंग करेंगे, न पुलिस, शीर्ष अदालत के आदेश के बाद हिमाचल पुलिस ने जारी किए निर्देश, प्रत्यक्षदर्शी गवाह बने तो पुलिस एक बार ही करेगी पूछताछ

Shimla : सड़क हादसे के किसी घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले किसी मददगार व्यक्ति को अब न तो अस्पताल तंग करेंगे, न ही पुलिस। सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद ऐसे निर्देश राज्य की पुलिस ने जारी किए हैं। एसपी कानून एवं व्यवस्था डॉ. खुशहाल शर्मा ने यह जानकारी दी है।

उन्होंने बताया कि सुप्रीमकोर्ट ने 2012 की सिविल याचिका संख्या 235 में सेव लाइफ फाउंडेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस में ये आदेश दिए हैं। इसके अनुसार अब सड़क दुर्घटना के प्रत्यक्षदर्शी, बाईस्टैंडर या गुड सेमेरिटन घायल व्यक्ति को निकटतम अस्पताल लेकर जा सकता है। ऐसी सूरत में ऐसे मददगार व्यक्ति को अस्पताल से तुरंत जाने की अनुमति दी जाएगी और उससे कोई प्रश्न नहीं पूछा जाएगा। प्रत्यक्षदर्शी को केवल पता बताने के बाद जाने दिया जाएगा। वह किसी सिविल और आपराधिक दायित्व के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। यदि हादसे से संबंधित कोई फोन कॉल करे तो भी उसे व्यक्तिगत रूप से अपना नाम और व्यक्तिगत विवरण बताने को बाध्य नहीं किया जाएगा।

नाम और संपर्क विवरण जैसी सूचनाएं अब स्वैच्छिक तथा वैकल्पिक होंगी। ऐसा अस्पतालों द्वारा उपलब्ध कराए गए एमएलसी फॉर्म में भी किया जाएगा। यदि कोई मददगार स्वेच्छा से उल्लेख करता है कि वह दुर्घटना का प्रत्यक्षदर्शी भी है और पुलिस द्वारा जांच के प्रयोजनों के लिए या परीक्षण के दौरान उसकी जांच की जानी आपेक्षित हो तो ऐसे व्यक्ति से एक बार ही पूछताछ की जाएगी।

मददगार को इनाम या मुआवजा मिलेगा

जांच या तो आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 284 के अंतर्गत एक आयोग के माध्यम से हो सकती है या औपचारिक रूप से दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 296 के अनुसार हलफनामे पर हो सकती है। सड़क दुर्घटनाओं में पीडि़तों की मदद के लिए आम नागरिकों को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसे लोगों को इनाम या मुआवजा भी दिया जाएगा। यदि कोई पुलिस अफसर ऐसे व्यक्ति को प्रताडि़त करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।

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