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पहाड़ी रियासतों में क्रांति की चिंगारी : रानी खैरागढ़ी

Rani Khairagari: The spark of revolution in hill states

निखिल ठाकुर ।।  जैसे जैसे हिमाचल की पहाड़ी रियासतों मैं अंग्रेज़ो का प्रभाव बढ़ने लगा वैसे वैसे कई रियासतों ने घुटने तक दिए, संसाधन कम थे तो विद्रोह का सवाल ही नहीं उठता मगर छोटी कशी मंडी की रियासत की रानी ललिता कुमारी ने बगावत का बिगुल फूंक कर अंग्रेज़ो के छक्के छुड़ा रखे थे आलम यह था कि गोरों ने रानी ललिता को उनकी अपनी रियासत से बेदखल कर उनके मंडी आने पर रोक लगा दी थी।

एक और सवाल जब नाम ललिता कुमारी था तो खैरागढ़ी क्यों कहलायी दरअसल राजा भवानी सेन की पत्नी ललिता मध्य भारत की खैरागढ़ रियासत की राजकुमारी थीं। इसलिए उन्हें खैरागढ़ी भी  कहा जाता था। साल 1912 में राजा भवानी सेन का निसंतान ही निधन हो गया। और धूर्त अंग्रेजों की परंपरा रही थी कि वारिस न होने पर सीधे तौर पर अपना कब्ज़ा जमा लेते थे । राजा भवानीसेन और ललिता के कोई अपनी संतान नहीं थी मगर बालक जोगिंदर सेन को गोद लिया गया था। यह वही जोगिंदर सेन हैं जिनके नाम पर सुक्राहट्टी नगर का नाम बदलकर जोगिंदर नगर रखा गया था

रानी खैरागढ़ी ने क्रांति का रास्ता अपना लिया और अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले लाला लाजपतराय के संगठन के लिए काम किया। उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष करने वालों को आर्थिक योगदान तो दिया ही, खुद भी सक्रिय भूमिका निभाई और अंग्रेजों से भिड़ गयी ।

रानी ललिता के बेटे जोगिंदर सेन बाद में रियासत के राजा बने। उन्होंने न सिर्फ कई विकास कार्य करवाए बल्कि देश के आजाद होने पर हिमाचल के गठन में भी अहम भूमिका निभाई।

बालक जोगिंदर सेन छोटा था, मगर रानी ललिता लगातार क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ी रहीं। बम बनाने का प्रशिक्षण भी उन्होंने लिया था। मंडी में गदर पार्टी के कई सदस्य सक्रिय थे और रानी खैरागढ़ी उनके संरक्षक की भूमिका में थीं। साल 1914 में योजना बनाई गई कि नागचला स्थित सरकारी खजाने को लूट लिया जाए। पंजाब से क्रांतिकारियों की तरफ से बनाए गए बम भी मंगवाए गए थे। क्रांतिकारी मंडी में अंग्रेज सुपरिटेंडेंट, वजीर और अन्य अंग्रेज अफसरों को उड़ाना चाहते थे। नागचला में खजाने को तो लूट लिया गया, मगर दलीप सिंह और पंजाब के क्रांतिकारी निधान सिंह पकड़े गए। पुलिस ने इन्हें भयंकर यातनाएं दीं और उन्होंने सभी सदस्यों के बारे में जानकारी दे दी।

बद्रीनाथ, शारदा राम, ज्वाला सिंह, मियां जवाहर सिंह और लौंगू नाम के क्रांतिकारियों को पुलिस ने पकड़कर जेल में डाल दिया। बात रानी खैरागढ़ी की आई तो उन्हें देश निकला दे दिया गया । कोई भी साधारण मनुष्य होता तो टूट जाता, मगर रानी ललिता ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने लखनऊ में प्रवास के दौरान कांग्रेस में सक्रियता से हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भी हिस्सा लिया और महिला कांग्रेस की अध्यक्ष भी चुनी गईं।

साल 1938 में जब मंडी रियासत का रजत जयंती समारोह था तो  जोगिंद्रसेन, जो मंडी के राजा थे, ने मां को लखनऊ से मंडी बुलाया। मां चल दी,  जोगिंद्रनगर (सुक्राहट्टी) में हराबाग नाम की जगह है, जहां पर क्रांतिकारियों के साथ वह बैठक कर रही थीं। गांववालों ने क्रांतिकारियों के लिए खाना भेजा मगर वह शायद खराब हो चुका था। रानी को हैजा हो गया और उनका निधन हो गया। अफसोस की वह आज़ादी देखे बिना ही इस दुनिया से चली गई।

वह ऐसी रानी थी जो न सिर्फ देशप्रेमी थी, बल्कि सार्थक रूप से  मजबूत और सशक्त महिला थी

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